नगर निगम ने शहर में कुत्तों के आतंक को रोकने के लिए जो रणनीति बनाई थी, उसका कोई खास असर दिखाई नहीं पड़ रहा है, तीन साल में 34 हजार से ज्यादा कुत्तों की नसबंदी हो चुकी है, लेकिन आक्रामकता उनमें जस की तस बनी है, एनीमल बर्थ कंट्रोल कार्यक्रम सवालों के घेरे में है, शहर में कुत्तों के आतंक का मामला कोई नया नहीं है, लंबे समय यह मुद्दा हंगामों की वजह बना, तीन साल पहले डॉग रेस्क्यू सेंटर बना तो बदलाव की नई उम्मीद जगी, परतापुर में यह सेंटर स्थापित हो गया, जिनमें कुत्तों की नसबंदी व टीकाकरण का काम किया जा रहा है, कुत्ते यहां लाए जाते हैं, उनकी नसबंदी व टीकाकरण के बाद वापस उनकी जगह पर छोड़ दिया जाता है। परतापुर के डॉग सेंटर का जिम्मा ओरैय्या की श्याम हैल्पिंग इनसाइट कंपनी पर है, कंपनी के 12 लोगों का स्टाफ है, जिनमें 2 डाक्टर, 1 मैनेजर, 7 कर्मचारी व 2 वाहन चालक हैं, यह टीम सुबह 5:00 बजे क्षेत्र में अभियान चलाती है। 9:00 बजे तक अभियान चलता है और कुत्तों को सेंटर लाया जाता है, इसके बाद सर्जरी कराई जाती है। टीम का मुख्य हथियार जाल होता है, करीब 4 लोगों की एक टीम होती है जो कुत्तों को पकड़ती है और वाहनों की मदद से डॉग सेंटर लाती है, टीम को कुत्तों को काबू करने में काफी मशक्कत करनी होती है, इसके बाद का काम सर्जरी की टीम संभालती है। सर्जरी के बाद 5 से 7 घंटे लगते हैं, 3 से 5 दिन इनकी निगरानी होती है और फिर वापस छोड़ दिया जाता है।
ब्यूरो रिपोर्ट।